
फरीदपुर, । रविवार की सुबह फरीदपुर मैथोडिस्ट चर्च में हल्की धूप खिड़कियों से छनकर अंदर आ रही थी। आम दिनों की तरह आराधना शुरू हुई, लोग बेंचों पर बैठे प्रार्थना कर रहे थे। मगर आज माहौल में कुछ अलग सी कसक थी। वजह थी पास्टर नीलिमा बेली और पास्टर बेन बेली का विदाई समारोह।
आराधना खत्म हुई तो चर्च के भीतर सन्नाटा सा छा गया। लोग धीरे-धीरे आगे बढ़े, किसी ने हाथ मिलाया, किसी ने गले लगाया। कई चेहरे मुस्कुरा रहे थे, लेकिन आंखों की नमी सब कुछ कह रही थी।
असल में मई 2024 में पादरी प्रमोद नंदा को फरीदपुर चर्च की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मगर उनके पास बरेली चर्च का काम भी था। ऐसे में उन्होंने फरीदपुर चर्च की सेवा का जिम्मा पास्टर बेली दंपती को सौंप दिया। बस, वहीं से कहानी बदलनी शुरू हुई।
चर्च के कैशियर वाटसन लाल पुराने दिन याद करते हुए कहते हैं, “जब ये लोग यहां आए थे, तब चर्च में मुश्किल से 20–25 लोग आते थे। कई बेंच खाली पड़ी रहती थीं। लेकिन अब हर रविवार करीब 100 लोग जुटते हैं। क्रिसमस या दूसरे त्योहारों पर तो 200–300 तक भीड़ हो जाती है।”
पास खड़े एलिक्स जौन ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “इन पास्टरों को इस सेवा के लिए कहीं से कोई पैसा नहीं मिलता। फिर भी इन्होंने पूरे मन से लोगों की सेवा की। दिन-रात चर्च और समाज के लिए लगे रहे।”
अजय बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब कई लोग चर्च आना छोड़ चुके थे। “लोग निराश थे, कोई काम में उलझ गया था। मगर जब से ये दोनों आए, माहौल बदल गया। लोगों का मन फिर से चर्च की ओर खिंचने लगा।”
फरीदपुर चर्च के इतिहास में भी इनका समय खास रहा। साल 1894 में स्थापित इस चर्च का जन्मदिन पहली बार अक्टूबर के दूसरे रविवार को इतने भव्य तरीके से मनाया गया। बच्चों के लिए वीबीएस (बाइबल वेकेशन स्कूल) हुआ, जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वहीं महिलाओं के लिए डब्ल्यूएससीएस कार्यक्रम भी हुआ, जिसमें चर्च की महिलाओं ने उत्साह से भाग लिया।
विदाई के वक्त कलेसिया के लोगों ने दोनों पास्टरों के गले में फूलों के हार डालकर सम्मान किया। कुछ लोग चुपचाप खड़े रहे, कुछ की आंखों से आंसू भी निकल पड़े।
अंत में सबने मिलकर प्रार्थना की। किसी ने धीमे से कहा, “प्रभु यीशु ने चाहा तो आप लोग फिर लौटेंगे।”
उस समय चर्च में आमोद जौन, अजय, अमित, शुभम, गुड्डू भैया, मुस्कान, जॉनी, गुड़िया, पूनम, डी. जौन, प्रिंस, सपना समेत कई लोग मौजूद थे। बाहर हल्की हवा चल रही थी, लेकिन चर्च के भीतर विदाई की नमी देर तक महसूस होती रही।



